दादी – नानी की 10 शार्ट कहानी 2021 – Dadi Nani Ki 10 Short Kahani 2021

 नमस्कार दोस्तों आज में ले कर आया हूँ  10 शार्ट स्टोरी इन 2020

चालाक महिला:-

एक दिन एक औरत गोल्फ खेल रही थी| जब उसने बॉल को हिट किया तो वह जंगल में चली गई|
जब वह बॉल को खोजने गई तो उसे एक मेंढक मिला जो जाल में फंसा हुआ था| मेंढक ने उससे कहा – “अगर तुम मुझे इससे आजाद कर दोगी तो मैं तुम्हें तीन वरदान दूँगा|
“महिला ने उसे आजाद कर दिया
मेंढक ने कहा – “धन्यवाद, लेकिन तीन वरदानों में मेरी एक शर्त है जो भी तुम माँगोगी तुम्हारे पति को उससे दस गुना मिलेगा|
महिला ने कहा – “ठीक है” उसने पहला वरदान मांगा कि मैं संसार की सबसे खुबसूरत स्त्री बनना चाहती हूँ|
मेंढक ने उसे चेताया – “क्या तुम्हें पता है कि ये वरदान तुम्हारे पति को संसार का सबसे सुंदर व्यक्ति बना देगा|
महिला बोली – “दैट्स ओके, क्योंकि मैं संसार की सबसे खुबसूरत स्त्री बन जाऊँगी और वो मुझे ही देखेगा!”
मेंढक ने कहा – “तथास्तु”
अपने दूसरे वरदान में उसने कहा कि मैं संसार की सबसे धनी महिला बनना चाहती हूँ|
मेंढक ने कहा – “यह तुम्हारे पति को विश्व का सबसे धनी पुरुष बना देगा और वो तुमसे दस गुना पैसे वाला होगा |”
महिला ने कहा – “कोई बात नहीं| मेरा सब कुछ उसका है और उसका सब कुछ मेरा !”
मेंढक ने कहा – “तथास्तु”
जब मेंढक ने अंतिम वरदान के लिये कहा तो उसने अपने लिए एक “हल्का सा हर्ट अटैक मांगा|”
मोरल ऑफ स्टोरीः महिलाएं बुद्धिमान होती हैं, उनसे बच के रहें !
महिला पाठकों से निवेदन है आगे ना पढें, आपके लिये जोक यहीं खत्म हो गया है | यहीं रुक जाएँ और अच्छा महसूस करें !!
पुरुष पाठकः कृपया आगे पढें|
उसके पति को उससे “10 गुना हल्का हार्ट अटैक” आया|
मोरल ऑफ द स्टोरी : महिलाएं सोचती हैं वे वास्तव में बुद्धिमान हैं|
उन्हें ऐसा सोचने दो, क्या फर्क पडता है| 



मोर और कौआ :-

एक दिन कौए ने जंगल में मोरों की बहुत- सी पूंछें बिखरी पड़ी देखीं। वह अत्यंत प्रसन्न होकर कहने लगा- वाह भगवान! बड़ी कृपा की आपने, जो मेरी पुकार सुन ली। मैं अभी इन पूंछों से अच्छा खासा मोर बन जाता हूं। इसके बाद कौए ने मोरों की पूंछें अपनी पूंछ के आसपास लगा ली। फिर वह नया रूप देखकर बोला- अब तो मैं मोरों से भी सुंदर हो गया हूं। अब उन्हीं के पास चलकर उनके साथ आनंद मनाता हूं। वह बड़े अभिमान से मोरों के सामने पहुंचा। उसे देखते ही मोरों ने ठहाका लगाया। एक मोर ने कहा- जरा देखो इस दुष्ट कौए को। यह हमारी फेंकी हुई पूंछें लगाकर मोर बनने चला है। लगाओ बदमाश को चोंचों व पंजों से कस-कसकर ठोकरें। यह सुनते ही सभी मोर कौए पर टूट पड़े और मार-मारकर उसे अधमरा कर दिया।
कौआ भागा-भागा अन्य कौए के पास जाकर मोरों की शिकायत करने लगा तो एक बुजुर्ग कौआ बोला- सुनते हो इस अधम की बातें। यह हमारा उपहास करता था और मोर बनने के लिए बावला रहता था। इसे इतना भी ज्ञान नहीं कि जो प्राणी अपनी जाति से संतुष्ट नहीं रहता, वह हर जगह अपमान पाता है। आज यह मोरों से पिटने के बाद हमसे मिलने आया है। लगाओ इस धोखेबाज को।
इतना सुनते ही सभी कौओं ने मिलकर उसकी अच्छी धुलाई की।


कहानी का सन्देश यह है कि ईश्वर ने हमें जिस रूप और आकार में बनाया है, हमें उसी में संतुष्ट रहकर अपने कर्मो पर ध्यान देना चाहिए। कर्म ही महानता का द्वार खोलता है।

दोस्ती :-

शहर से दूर जंगल में एक पेड़ पर गोरैया का जोड़ा रहता था। उनके नाम थे, चीकू और चिनमिन। दोनो बहुत खुश रहते थे। सुबह सवेरे दोनो दाना चुगने के लिये निकल जाते। शाम होने पर अपने घोंसले मे लौट जाते। कुछ समय बाद चिनमिन ने अंडे दिये।

चीकू और चिनमिन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दानों ही बड़ी बेसब्री से अपने बच्चों के अंडों से बाहर निकलने का इंतजार करने लगे। अब चिनमिन अंडों को सेती थी और चीकू अकेला ही दाना चुनने के लिये जाता था।

एक दिन एक हाथी धूप से बचने के लिये पेड़ के नीचे आ बैठा। मदमस्त हो कर वह अपनी सूँड़ से उस पेड़ को हिलाने लगा। हिलाने से पेड़ की वह डाली टूट गयी, जिस पर चीकू और चिनमिन का घोंसला था। इस तरह घोंसले में रखे अंडे टूट गये।

अपने टूटे अंडों को देख कर चिनमिन जोरों से रोने लगी। उसके रोने की आवाज सुन कर, चीकू और चिनमिन का दोस्त भोलू — उसके पास आये और रोने का कारण पूछने लगे।

चिनमिन से सारी बात सुनकर उन्हें बहुत दुख हुआ। फिर दोनो को धीरज बँधाते हुए भोलू — बोला, “अब रोने से क्या फायदा, जो होना था सो हो चुका।”

चीकू बोला, “भोलू भाई, बात तो तुम ठीक कर रहे हो, परंतु इस दुष्ट हाथी ने घमंड में आ कर हमारे बच्चों की जान ले ली है। इसको तो इसका दंड मिलना ही चाहिये। यदि तुम हमारे सच्चे दोस्त हो तो उसको मारने में हमारी मदद करो।”

अंधा घोड़ा :-

शहर के नज़दीक बने एक फॉर्म हाउस में दो घोड़े रहते थे। दूर से देखने पर वो दोनों बिल्कुल ठीक दिखते थे, पर पास जाने पर पता चलता था कि उनमे से एक घोड़ा अँधा है। पर अंधे होने के बावजूद फॉर्म के मालिक ने उसे वहां से निकाला नहीं था। बल्कि उसे और भी अधिक सुरक्षा और आराम के साथ रखा था।

अगर कोई थोडा और ध्यान देता तो उसे ये भी पता चलता कि मालिक ने दूसरे घोड़े के गले में एक घंटी बाँध रखी थी, जिसकी आवाज़ सुनकर अँधा घोड़ा उसके पास पहुंच जाता और उसके पीछे-पीछे बाड़े में घूमता। घंटी वाला घोड़ा भी अपने अंधे मित्र की परेशानी समझता था, वह बीच-बीच में पीछे मुड़कर देखता और इस बात को सुनिश्चित करता कि कहीं उसका साथी रास्ते से भटक ना जाए। वह ये भी सुनिश्चित करता कि उसका मित्र सुरक्षित; वापस अपने स्थान पर पहुच जाए, और उसके बाद ही वो अपनी जगह की ओर बढ़ता था।

दोस्तों! बाड़े के मालिक की तरह ही भगवान हमें बस इसलिए नहीं छोड़ देते कि हमारे अन्दर कोई दोष या कमियां हैं। वो हमारा ख्याल रखते हैं, और हमें जब भी ज़रुरत होती है तो किसी ना किसी को हमारी मदद के लिए भेज देते हैं। कभी-कभी हम वो अंधे घोड़े होते हैं, जो भगवान द्वारा बांधी गयी घंटी की मदद से अपनी परेशानियों से पार पाते हैं। तो कभी हम अपने गले में बंधी घंटी द्वारा दूसरों को रास्ता दिखाने के काम आते हैं॥

अब पछताये होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गई खेत :-

एक परिवार था। जिनके पास बहुत बीघा जमीन थी। घर में चार लड़के थे। 

चारों खेत में मेहनत मजदूरी करके कमाते थे। 

परिवार बहुत बड़ा था जितना वे मेहनत करते, उतना उन्हें मिलता ना था

 क्यूंकि खेत में पानी की कमी थी और

मौसम की मार पड़ती ही जा रही थी। जिसके कारण खाने तक के लाले थे तो 

बच्चो की पढाई तो दूर की बात हैं।

अगर इस बीच कोई बीमार हो जाए तो गरीबी में आटा गीला जैसी बात हो जायें।

 परिवार बहुत बड़ा था 

जिस कारण आपसी लड़ाईया भी बढ़ती जा रही थी वैचारिक मतभेद था सभी 

अपने खेत के लिए कुछ अलग करके कमाना चाहते थे। जिसे देखकर परिवार

 के मुखियाँ ने खेत को 

चार बराबर हिस्सों में बाँट दिया और सभी भाईयों को अपने- अपने 

परिवार की ज़िम्मेदारी सौंप दी ताकि जिसे जो बेहतर लगे वो करे।

अकाल की स्थिती थी। ऐसे में चारो परिवार दुखी थे। तब ही एक उद्योगपति गाँव में आया। 

उसने इन चारो भाईयों के सामने एक प्रस्ताव रखा जिसमे उसने इनकी जमीन मांगी और 

बदले में जमीन की कीमत के साथ परिवार के जो भी सदस्य काम करना

 चाहते हैं उन्हें नौकरी का वादा किया।

दुसरे दिन, छोटे भाई ने सभी को विस्तार से पूरी बात बताई। और कहा कि वो 

इस प्रस्ताव के लिए तैयार हैं लेकिन बड़े दोनों भाईयों ने इन्कार कर दिया।

 उन दोनों ने कहा यह पुश्तैनी जमीन हैं।

हमारी पूज्यनीय हैं। भूखे मर जायेंगे लेकिन हम जमीन ना देंगे। छोटे भाई ने

बहुत समझाया लेकिन वे नहीं माने।
कुछ दिनों बाद, उद्योगपति ने यह प्रस्ताव अन्य खेत के मालिक को दिया। 

उन लोगो ने विकट परिस्थितियों
एवम बच्चो के भविष्य को देखते हुए, प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

कुछ समय बाद, उस जमीन पर एक उद्योग बना। जहाँ कई ग्राम वासियों को नौकरी मिली।
साथ ही उस 

जमीन मालिक को जमीन की कीमत और उसके बच्चो को नौकरी भी मिली।

जिससे उन लोगो ने अपना अन्य कारोबार भी शुरू किया और दुसरे शहरों में जमीन भी खरीदी। 

और उनका जीवन सुधार गया।उन्होंने एक बड़ा सा बंगला बनाया। जिसमे 

बाग़ को सम्भालने का काम वो चारो करते थे जिन्हें पहले उद्योग का प्रस्ताव मिला था।

एक दिन वो उद्योगपति उस घर में आया और उसने इन चारों को देख कर पहचान लिया 
और पूछा कैसा चल रहा हैं ?

 तब सिर झुकारक कहा साहूकार का कर्ज बढ़ गया था जमीन हाथ से चली गई 
अब मजदुर और बाग़ का काम करते हैं।

 उद्योगपति ने कहा- अगर आप मान लेते तो यह दशा ना होती।
उस पर छोटे भाई ने करुण स्वर में कहा – अब पछताये होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गई खेत 


कीमती पत्थर :-

एक युवक कविताएँ लिखता था, लेकिन उसके इस गुण का कोई मूल्य नहीं समझता था। घरवाले भी उसे ताना मारते रहते कि तुम किसी काम के नहीं, बस कागज काले करते रहते हो। उसके अन्दर हीन-भावना घर कर गयी| उसने एक जौहरी मित्र को अपनी यह व्यथा बतायी| जौहरी ने उसे एक पत्थर देते हुए कहा – जरा मेरा एक काम कर दो। यह एक कीमती पत्थर है। कई तरह के लोगो से इसकी कीमत का पता लगाओ, बस इसे बेचना मत। युवक पत्थर लेकर चला गया| वह पहले एक कबाड़ी वाले के पास गया। कबाड़ी वाला बोला – पांच रुपये में मुझे ये पत्थर दे दो।

फिर वह सब्जी वाले के पास गया। उसने कहा तुम एक किलो आलू के बदले यह पत्थर दे दो, इसे मै बाट की तरह इस्तेमाल कर लूँगा। युवक मूर्तिकार के पास गया| मूर्तिकार ने कहा – इस पत्थर से मै मूर्ति बना सकता हूँ, तुम यह मुझे एक हजार में दे दो। आख़िरकार युवक वह पत्थर लेकर रत्नों के विशेषज्ञ के पास गया। उसने पत्थर को परखकर बताया – यह पत्थर बेशकीमती हीरा है जिसे तराशा नहीं गया। करोड़ो रुपये भी इसके लिए कम होंगे। युवक जब तक अपने जौहरी मित्र के पास आया, तब तक उसके अन्दर से हीन भावना गायब हो चुकी थी। और उसे एक सन्देश मिल चुका था।

मोरल : हमारा जीवन बेशकीमती है, बस उसे विशेषज्ञता के साथ परखकर उचित जगह पर उपयोग करने की आवश्यकता है|

उबलते पानी और मेंढक :-

एक बार एक मेंढक के शरीर में बदलाव करने की क्षमता को जाँचने के लिए कुछ वैज्ञानिकों ने उस मेंढक को एक काँच के जार में डाल दिया और उसमे जार की आधी ऊंचाई तक पानी भर दिया । फिर उस जार को धीरे धीरे गर्म किया जाने लगा, जब गर्मी बर्दाश्त से बाहर हो जाये तब मेंढक उस जार से बाहर कूद  सके इसलिए, जार का मुँह ऊपर से खुला रखा गया ।

मेंढक को अपने शरीर में गर्मी महसूस हुई और अपने शरीर की ऊर्जा को उसने अपने आपको बाहर की गर्मी से तालमेल बिठाने में लगाना शुरू किया ! मेंढक के शरीर से पसीना निकलने लगा, वो अपनी ऊर्जा का उपयोग तालमेल बिठाने में लगा रहा था, एक वक़्त ऐसा आया की मेंढक की गर्मी से और लड़ने की क्षमता कम होने लगी, और मेंढक ने जार से बाहर कूदने की कोशिश की, मगर वो बाहर जाने की बजाय पानी में गिर जाया करता और बार बार की कोशिश के बाद भी मेंढक बाहर नही निकल पाया क्यूँकि बाहर कूदने में लगने वाली शक्ति वो गर्मी से लड़ने में पहले ही ज़ाया कर चुका था, तो अगर सही वक़्त पे मेंढक कूदने का फ़ैसला लेता तो शायद उसकी जान बच सकती थी ।

हमें अपने आसपास के माहौल से लड़ना तो ज़रूर है लेकिन सही वक़्त आने और पर्याप्त ऊर्जा रहते उस माहौल से बाहर निकलना भी ज़रूरी है !!


हिसाब बराबर

एक डॉक्टर ने नया-नया क्लीनिक खोला तो बाहर बोर्ड टाँग दिया, जिस पर लिखा था, “किसी भी बीमारी का इलाज़ मात्र 300/- रुपये में और अगर हम आपका इलाज़ नहीं कर पाये तो हम आपको 1000/- रुपये देंगे।”

यह बोर्ड पढ़कर एक दिन एक आदमी के मन में ख्याल आया कि क्यों न कोई चालाकी की जाये और 1000/- रुपये कमाये जाएँ। इसी सोच के साथ आदमी डॉक्टर के पास पहुँच गया।

डॉक्टर: आईये बैठिये, बताइये क्या तक़लीफ है आपको?

आदमी: डॉक्टर साहब, मैं अपना स्वाद खो चुका हूँ। कुछ भी खाता या पीता हूँ तो स्वाद का पता ही नहीं चलता।

डॉक्टर ने पूरी बात सुनी और नर्स से कहा कि 22 नंबर वाली बोतल में से कुछ बूंदे इनकी जीभ पर डाल दो। नर्स से जैसे ही बूंदे आदमी की जीभ पर डाली, आदमी एक दम से चिल्लाया, “यह तो पेशाब है।”

डॉक्टर: मुबारक हो आपका स्वाद वापस आ गया।

आदमी बहुत शर्मिंदा हुआ और उसे 300/- रूपये भी गंवाने पड़े। कुछ दिनों बाद वो फिर से डॉक्टर के पास अपना हिसाब बराबर करने पहुँच गया।

डॉक्टर: जी अब क्या तकलीफ हो गयी।

चार मूर्ख :-

एक बार काशी नरेश ने अपने मंत्री को यह आदेश दिया कि जाओ और तीन दिन के
भीतर चार मूर्खों को मेरे सामने पेश करो। यदि तुम ऐसा नहीं कर सके तो तुम्हारा सिर
कलम कर दिया जाएगा।

पहले तो मंत्री जी थोड़े से घबराये लेकिन मरता क्या न करता। राजा का हुक्म जो था।
ईश्वर का स्मरण कर मूर्खों की खोज में चल पड़े।

कुछ मील चलने के बाद उसने एक आदमी को देखा जो गदहे पर सवार था और सिर पर एक बड़ी
सी गठरी उठाये हुए था।
मंत्री को पहला मूर्ख मिल चुका था। मंत्री ने चैन की सांस ली।

कुछ और आगे बढ़ने पर दूसरा मूर्ख भी मिल गया। वह लोगों को लड्डू बाँट रहा था। 
पूछने पर पता चला कि 
शत्रु के साथ भाग गयी उसकी बीबी ने एक बेटे को जन्म दिया था 
जिसकी ख़ुशी में वह लड्डू बाँट रहा था।

दोनों मूर्खों को लेकर मंत्री राजा के पास पहुंचा।
राजा ने पूछा – ये तो दो ही हैं? तीसरा मूर्ख कहाँ है?

महाराज वह मैं हूँ। जो बिना सोचे समझे मूर्खों की खोज में निकल पड़ा। बिना कुछ सोचे समझे 
आपका हुक्म बजाने चल पड़ा।और चौथा मूर्ख ?

क्षमा करें महाराज? वह आप हैं। जनता की भलाई और राज काज के काम के बदले 
आप मूर्खों की खोज को इतना जरुरी काम मानते हैं।

राजा की आँखें खुल गयी और उनसे मंत्री से क्षमा मांगी।

इन्सान की सोच ही जीवन का आधार हैं :-

तीन राहगीर रास्ते पर एक पेड़ के नीचे मिले। तीनो लम्बी यात्रा पर निकले थे।
कुछ देर सुस्ताने के लिए पेड़ की घनी छाया में बैठ गए। तीनो के पास दो झोले थे
एक झोला आगे की तरफ और दूसरा पीछे की तरफ लटका हुआ था।

तीनो एक साथ बैठे और यहाँ-वहाँ की बाते करने लगे जैसे कौन कहाँ से आया? कहाँ जाना हैं? 

कितनी दुरी हैं ? घर में कौन कौन हैं ?ऐसे कई सवाल जो अजनबी एक दुसरे के 
बारे में जानना चाहते हैं।
तीनो यात्री कद काठी में सामान थे पर सबके चेहरे के भाव अलग-अलग थे। 
एक बहुत थका निराश लग रहा था 
जैसे सफ़र ने उसे बोझिल बना दिया हो। दूसरा थका हुआ था
 पर बोझिल नहीं लग रहा था
और तीसरा अत्यन्त आनंद में था। एक दूर बैठा महात्मा इन्हें देख मुस्कुरा रहा था।

तभी तीनो की नजर महात्मा पर पड़ी और उनके पास जाकर तीनो ने सवाल किया

 कि वे मुस्कुरा क्यूँ रहे हैं। इस सवाल के जवाब में महात्मा ने तीनो से सवाल किया कि 

तुम्हारे पास दो दो झोले हैं इन में से एक में तुम्हे लोगो की अच्छाई को रखना हैं और
एक में बुराई को बताओ क्या करोगे ?

एक ने कहा मेरे आगे वाले झोले में, मैं बुराई रखूँगा ताकि जीवन भर उनसे दूर रहू।

और पीछे अच्छाई रखूँगा। दुसरे ने कहा- मैं आगे अच्छाई रखूँगा ताकि उन जैसा बनू और पीछे बुराई 

ताकि उनसे अच्छा बनू। तीसरे ने कहा मैं आगे अच्छाई रखूँगा ताकि उनके साथ
 संतुष्ट रहूँ और पीछे बुराई रखूँगा 
और पीछे के थैले में एक छेद कर दूंगा जिससे वो बुराई का बोझ कम होता रहे हैं और 
अच्छाई ही मेरे साथ रहे
अर्थात वो बुराई को भूला देना चाहता था।
यह सुनकर महात्मा ने कहा – पहला जो सफ़र से थक कर निराश दिख रहा हैं जिसने कहा 

कि वो बुराई सामने रखेगा वो इस यात्रा के भांति जीवन से थक गया हैं
 क्यूंकि उसकी सोच नकारात्मक हैं 
उसके लिए जीवन कठिन हैं।
दूसरा जो थका हैं पर निराश नहीं, जिसने कहा अच्छाई सामने रखूँगा पर
 बुराई से बेहतर बनने की कोशिश 

में वो थक जाता हैं क्यूंकि वो बेवजह की होड़ में हैं।
तीसरा जिसने कहा वो अच्छाई आगे रखता हैं और बुराई को पीछे रख 
उसे भुला देना चाहता हैं वो संतुष्ट हैं
और जीवन का आनंद ले रहा हैं। इसी तरह वो जीवन यात्रा में खुश हैं। 

नमस्कार दोस्तों कैसी लगी हमारी 10 शार्ट स्टोरी ऐसी और स्टोरी देखने के लिए होम पेज पर फॉलो बटन को प्रेस कर ले जिसे से मेरी हर पोस्ट की नोटिफिकेशन आपको सबसे पहले मिले 
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