Top 20 Most Inspiring Mahatma Gandhi Quotes – Daily Hindi Post

  Top 20 Most Inspiring Mahatma Gandhi Quotes 



जन्म:- [ 2 अक्टूबर, 1869, पोरबंदर, काठियावाड़ एजेंसी (अब गुजरात) ]   मृत्यु:- [ 30 जनवरी 1948, दिल्ली ]


अहिंसा मेरे विश्वास का पहला लेख है। यह मेरे पंथ का अंतिम लेख भी है।

 ~ महात्मा गांधी

एक विनम्र तरीके से, आप दुनिया को हिला सकते हैं।

 ~ महात्मा गांधी

 आप सोच सकते हैं कि आपके कार्य व्यर्थ हैं और वे मदद नहीं करेंगे, लेकिन यह कोई बहाना नहीं है, फिर भी आपको कार्य करना होगा।

 ~ महात्मा गांधी

प्रार्थना स्वयं की अयोग्यता और कमजोरी का एक स्वीकारोक्ति है।

 ~ महात्मा गांधी

एक आँख के लिए एक आँख ही पूरी दुनिया को अंधा बना देती है।

 ~ महात्मा गांधी

परमेश्वर कभी भी अभिमानी की प्रार्थना का जवाब नहीं देता, न ही उन लोगों की प्रार्थना करता है जो उसके साथ मोलभाव करते हैं। यदि आप उसे आपकी मदद करने के लिए कहेंगे, तो उसे अपने सभी नग्नता में जाना चाहिए; बिना किसी डर या संदेह के, बिना आरक्षण के उससे संपर्क करें कि कैसे वह आपके जैसे गिरे हुए व्यक्ति की मदद कर सकता है।

 ~ महात्मा गांधी

यह मेरी शक्ति से परे है कि तुम परमात्मा में एक विश्वास पैदा करो। कुछ चीजें हैं जो स्वयं सिद्ध हैं और कुछ ऐसी हैं जो बिल्कुल भी सिद्ध नहीं हैं।

 ~ महात्मा गांधी

एक सम्माननीय आदमी के लिए इससे ज्यादा दुखदायी कुछ नहीं हो सकता कि उस पर बुरे विश्वास का आरोप लगाया जाए।

 ~ महात्मा गांधी

एक खाली पेट भोजन करने वाले व्यक्ति के लिए भगवान है।

 ~ महात्मा गांधी

मैं भविष्य का पूर्वाभास नहीं करना चाहता। मैं वर्तमान का ख्याल रखने से चिंतित हूं। भगवान ने मुझे आने वाले पल पर कोई नियंत्रण नहीं दिया है।

 ~ महात्मा गांधी

मैं अपने व्यक्तित्व की पूर्ण अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्रता चाहता हूं।

 ~ महात्मा गांधी

जब मैं सूर्यास्त के आश्चर्य या चंद्रमा की सुंदरता की प्रशंसा करता हूं, तो मेरी आत्मा निर्माता की पूजा में फैल जाती है।

 ~ महात्मा गांधी

यह युद्ध लड़ने वालों के बीच न्याय करने के लिए खुला है और अपनी ओर से न्याय करने वाले व्यक्ति के लिए सफलता की कामना करता है। ऐसा करके वह दोनों के बीच शांति बनाए रखने की संभावना केवल एक दर्शक की तुलना में बाकी है।

 ~ महात्मा गांधी

शांति मानव जाति का सबसे शक्तिशाली हथियार है। एक देने के बजाय एक झटका लेने के लिए अधिक साहस चाहिए। युद्ध शुरू करने की तुलना में चीजों को आजमाने और बात करने के लिए अधिक साहस चाहिए।

 ~ महात्मा गांधी

आप मुट्ठी से मुट्ठी नहीं बांध सकते।

 ~ महात्मा गांधी

परमेश्वर कभी-कभी उन लोगों की पूरी कोशिश करता है जिन्हें वह आशीर्वाद देना चाहता है।

 ~ महात्मा गांधी

मेरा जीवन एक अविभाज्य संपूर्ण है, और मेरी सभी गतिविधियाँ एक दूसरे में चलती हैं और मानव जाति के मेरे अतुल्य प्रेम में उनका उदय होता है।

 ~ महात्मा गांधी

मेरा सबसे बड़ा हथियार मूक प्रार्थना है।

 ~ महात्मा गांधी

मैं तुच्छ व्यक्ति हो सकता हूं, लेकिन जब सत्य मेरे माध्यम से बोलता है तो मैं अजेय हूं।

 ~ महात्मा गांधी

प्रोविडेंस के पास हर चीज के लिए निर्धारित समय होता है। हम परिणाम की आज्ञा नहीं दे सकते, हम केवल प्रयास कर सकते हैं।

 ~ महात्मा गांधी

 

 प्रारंभिक जीवन:- ( Gandhi quotes about life ) मोहनदास करमचन्द गान्धी का जन्म भारत में गुजरात के एक तटीय शहर पोरबंदर में 2 अक्टूबर सन् 1869 को हुआ था। उनके पिता करमचन्द गान्धी ब्रिटिश राज के समय काठियावाड़ की एक छोटी सी रियासत (पोरबंदर) के दीवान थे। मोहनदास की माता पुतलीबाई परनामी वैश्य समुदाय से ताल्लुक रखती थीं और अत्यधिक धार्मिक प्रवित्ति की थीं जिसका प्रभाव युवा मोहनदास पड़ा और इन्ही मूल्यों ने आगे चलकर उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। वह नियमित रूप से व्रत रखती थीं और परिवार में किसी के बीमार पड़ने पर उसकी सेवा सुश्रुषा में दिन-रात एक कर देती थीं। इस प्रकार मोहनदास ने स्वाभाविक रूप से अहिंसा, शाकाहार, आत्मशुद्धि के लिए व्रत और विभिन्न धर्मों और पंथों को मानने वालों के बीच परस्पर सहिष्णुता को अपनाया।सन 1883 में साढे 13 साल की उम्र में ही उनका विवाह 14 साल की कस्तूरबा से करा दिया गया। जब मोहनदास 15 वर्ष के थे तब इनकी पहली सन्तान ने जन्म लिया लेकिन वह केवल कुछ दिन ही जीवित रही। उनके पिता करमचन्द गाँधी भी इसी साल (1885) में चल बसे। बाद में मोहनदास और कस्तूरबा के चार सन्तान हुईं – हरीलाल गान्धी (1888), मणिलाल गान्धी (1892), रामदास गान्धी (1897) और देवदास गांधी (1900)।उनकी मिडिल स्कूल की शिक्षा पोरबंदर में और हाई स्कूल की शिक्षा राजकोट में हुई। शैक्षणिक स्तर पर मोहनदास एक औसत छात्र ही रहे। सन 1887 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा अहमदाबाद से उत्तीर्ण की। इसके बाद मोहनदास ने भावनगर के शामलदास कॉलेज में दाखिला लिया पर ख़राब स्वास्थ्य और गृह वियोग के कारण वह अप्रसन्न ही रहे और कॉलेज छोड़कर पोरबंदर वापस चले गए।

 

 कार्य/उपलब्धियां:- ( mahatma gandhi quotes on leadership )सतंत्रता आन्दोलन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई महात्मा गांधी के नाम से मशहूर मोहनदास करमचंद गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक नेता थे। सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धान्तो पर चलकर उन्होंने भारत को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके इन सिद्धांतों ने पूरी दुनिया में लोगों को नागरिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिये प्रेरित किया। उन्हें भारत का राष्ट्रपिता भी कहा जाता है। सुभाष चन्द्र बोस ने वर्ष 1944 में रंगून रेडियो से गान्धी जी के नाम जारी प्रसारण में उन्हें राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित किया था।महात्मा गाँधी समुच्च मानव जाति के लिए मिशाल हैं। उन्होंने हर परिस्थिति में अहिंसा और सत्य का पालन किया और लोगों से भी इनका पालन करने के लिये कहा। उन्होंने अपना जीवन सदाचार में गुजारा। वह सदैव परम्परागत भारतीय पोशाक धोती व सूत से बनी शाल पहनते थे। सदैव शाकाहारी भोजन खाने वाले इस महापुरुष ने आत्मशुद्धि के लिये कई बार लम्बे उपवास भी रक्खे। और किसानों, मजदूरों और श्रमिकों को भारी भूमि कर और भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष करने के लिये एकजुट किया। सन 1921 में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बागडोर संभाली और अपने कार्यों से देश के राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य को प्रभावित किया। उन्होंने सन 1930 में नमक सत्याग्रह और इसके बाद 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन से खासी प्रसिद्धि प्राप्त की। भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान कई मौकों पर गाँधी जी कई वर्षों तक उन्हें जेल में भी रहे।

 


विदेश में शिक्षा और वकालत:- ( mahatma gandhi thoughts for students ) मोहनदास अपने परिवार में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे थे इसलिए उनके परिवार वाले ऐसा मानते थे कि वह अपने पिता और चाचा का उत्तराधिकारी (दीवान) बन सकते थे। उनके एक परिवारक मित्र मावजी दवे ने ऐसी सलाह दी कि एक बार मोहनदास लन्दन से बैरिस्टर बन जाएँ तो उनको आसानी से दीवान की पदवी मिल सकती थी। उनकी माता पुतलीबाई और परिवार के अन्य सदस्यों ने उनके विदेश जाने के विचार का विरोध किया पर मोहनदास के आस्वासन पर राज़ी हो गए। वर्ष 1888 में मोहनदास यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में कानून की पढाई करने और बैरिस्टर बनने के लिये इंग्लैंड चले गये। अपने माँ को दिए गए वचन के अनुसार ही उन्होंने लन्दन में अपना वक़्त गुजारा। वहां उन्हें शाकाहारी खाने से सम्बंधित बहुत कठिनाई हुई और शुरूआती दिनो में कई बार भूखे ही रहना पड़ता था। धीरे-धीरे उन्होंने शाकाहारी भोजन वाले रेस्टोरेंट्स के बारे में पता लगा लिया। इसके बाद उन्होंने वेजीटेरियन सोसाइटी की सदस्यता भी ग्रहण कर ली। इस सोसाइटी के कुछ सदस्य थियोसोफिकल सोसाइटी के सदस्य भी थे और उन्होंने मोहनदास को गीता पढने का सुझाव दिया।जून 1891 में गाँधी भारत लौट गए और वहां जाकर उन्हें अपनी मां के मौत के बारे में पता चला। उन्होंने बॉम्बे में वकालत की शुरुआत की पर उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। इसके बाद वो राजकोट चले गए जहाँ उन्होंने जरूरतमन्दों के लिये मुकदमे की अर्जियाँ लिखने का कार्य शुरू कर दिया परन्तु कुछ समय बाद उन्हें यह काम भी छोड़ना पड़ा।आख़िरकार सन् 1893 में एक भारतीय फर्म से नेटल (दक्षिण अफ्रीका) में एक वर्ष के करार पर वकालत का कार्य स्वीकार कर लिया।गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका में (1893-1914) :गाँधी 24 साल की उम्र में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे। वह प्रिटोरिया स्थित कुछ भारतीय व्यापारियों के न्यायिक सलाहकार के तौर पर वहां गए थे। उन्होंने अपने जीवन के 21 साल दक्षिण अफ्रीका में बिताये जहाँ उनके राजनैतिक विचार और नेतृत्व कौशल का विकास हुआ। दक्षिण अफ्रीका में उनको गंभीर नस्ली भेदभाव का सामना करना पड़ा। एक बार ट्रेन में प्रथम श्रेणी कोच की वैध टिकट होने के बाद तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने से इन्कार करने के कारण उन्हें ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। ये सारी घटनाएँ उनके के जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ बन गईं और मौजूदा सामाजिक और राजनैतिक अन्याय के प्रति जागरुकता का कारण बनीं। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर हो रहे अन्याय को देखते हुए उनके मन में ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत भारतियों के सम्मान तथा स्वयं अपनी पहचान से सम्बंधित प्रश्न उठने लगे।दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी ने भारतियों को अपने राजनैतिक और सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने भारतियों की नागरिकता सम्बंधित मुद्दे को भी दक्षिण अफ़्रीकी सरकार के सामने उठाया और सन 1906 के ज़ुलु युद्ध में भारतीयों को भर्ती करने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों को सक्रिय रूप से प्रेरित किया। गाँधी के अनुसार अपनी नागरिकता के दावों को कानूनी जामा पहनाने के लिए भारतीयों को ब्रिटिश युद्ध प्रयासों में सहयोग देना चाहिए।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का संघर्ष (1916-1945) :वर्ष 1914 में गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस लौट आये। इस समय तक गांधी एक राष्ट्रवादी नेता और संयोजक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। वह उदारवादी कांग्रेस नेता गोपाल कृष्ण गोखले के कहने पर भारत आये थे और शुरूआती दौर में गाँधी के विचार बहुत हद तक गोखले के विचारों से प्रभावित थे। प्रारंभ में गाँधी ने देश के विभिन्न भागों का दौरा किया और राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को समझने की कोशिश की।

 देश का विभाजन और आजादी:-जैसा कि पहले कहा जा चुका है, द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होते-होते ब्रिटिश सरकार ने देश को आज़ाद करने का संकेत दे दिया था। भारत की आजादी के आन्दोलन के साथ-साथ, जिन्ना के नेतृत्व में एक अलग मुसलमान बाहुल्य देश (पाकिस्तान) की भी मांग तीव्र हो गयी थी और 40 के दशक में इन ताकतों ने एक अलग राष्ट्र पाकिस्तान की मांग को वास्तविकता में बदल दिया था। गाँधी जी देश का बंटवारा नहीं चाहते थे क्योंकि यह उनके धार्मिक एकता के सिद्धांत से बिलकुल अलग था पर ऐसा हो न पाया और अंग्रेजों ने देश को दो टुकड़ों – भारत और पाकिस्तान – में विभाजित कर दिया।

 

गाँधी जी की हत्या:-30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की दिल्ली के बिरला हाउस में शाम 5:17 पर हत्या कर दी गयी। गाँधी जी एक प्रार्थना सभा को संबोधित करने जा रहे थे जब उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे ने उबके सीने में 3 गोलियां दाग दी। ऐसे माना जाता है की हे राम उनके मुख से निकले अंतिम शब्द थे। नाथूराम गोडसे और उसके सहयोगी पर मुकदमा चलाया गया और 1949 में उन्हें मौत की सजा सुनाई गयी।

 

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